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हस्ती न सही एक अर्से तक अंदाज़ रहते हैं,
लोग रहें न रहें लोगों के अल्फ़ाज़ रहते हैं

तार बजते थे जब मंज़र शबाब पर होता था,
तार टूटे पर गूंजते ये साज़ रहते हैं

ज़्यादा रौशनी भी आपको खतरे में डाल सकती है,
मेरे जुगनू मुझसे ये राज़ कहते हैं

उन्हें आंखों के मोती का मोल कैसे मालूम हो पाए,
जिन शाहों की उँगलियों तले पुखराज रहते हैं

इनकी बातों में न आना, ये उड़ान को उँगलियों पर नापते हैं;
बाज़ गिरे तो अपाहिज, मुर्गा उड़े तो परवाज़ कहते हैं

बारिशों का मज़ा जवाँ होने में है,
हमारे यहाँ पर उम्रदराज़ कहते हैं

सफर ठहर ज़रूर गया हो, मगर इन्तेहाँ अब भी बहुत दूर है,
अभी होने को बाकी कई आग़ाज़ रहते हैं।

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